यदा यदा हि धर्मस्य…” से विदुर नीति तक—प्रकृति संरक्षण और जनकल्याण का संदेश लेकर बिजनौर पहुंचे पूर्व आईएएस डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 4, श्लोक 7 विदुरकुटी पहुंचकर महात्मा विदुर को किया नमन, गंगा की अविरलता और प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश
बिजनौर । पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह ने अपने गृह जनपद बिजनौर पहुंचकर ऐतिहासिक, पौराणिक और आध्यात्मिक स्थलों का दर्शन किया। इस दौरान उन्होंने विदुरकुटी पहुंचकर महात्मा विदुर की मंदिर में पूजा-अर्चना की और क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को नमन किया। उन्होंने कहा कि जनकल्याण का मार्ग प्रकृति के संरक्षण से ही होकर आगे बढ़ेगा।प्रशासनिक सेवा के दौरान विभिन्न जनपदों में कार्य करने के अनुभवों के साथ डॉ. सिंह जनकल्याण, प्रकृति संरक्षण, गौमाता की रक्षा तथा गौवंश और अन्य पशुओं के लिए हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में भी निरंतर प्रयासरत हैं। नैपियर घास के रोपण को लेकर भी वह लोगों को जागरूक करते रहे हैं।बिजनौर की धरती को बताया गौरवशालीडॉ. दिनेश चन्द्र सिंह ने बिजनौर की पौराणिक और ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह जनपद अत्यंत प्राचीन स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है। उन्होंने महाभारत और अभिज्ञान शाकुंतलम् से जुड़ी परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतवर्ष की सांस्कृतिक चेतना में इस क्षेत्र का विशेष महत्व रहा है।उन्होंने कहा कि बिजनौर आज ज्ञान, विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में भी अग्रणी है। यहां के लोगों की सरलता के साथ उनकी प्रतिभा, परिश्रम और मेधा उन्हें न्यायिक, प्रशासनिक, वैज्ञानिक, कृषि तथा फिल्म जगत सहित विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट स्थान दिलाती है।डॉ. सिंह ने अपने गृह जनपद के नागरिकों, माता-पिता, गुरुजनों और यहां की पवित्र मातृभूमि को नमन करते हुए कहा कि अपनी जन्मभूमि पर लौटना उनके लिए भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव है।महात्मा विदुर की तपोभूमि को किया नमन विदुरकुटी के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महात्मा विदुर ने महाभारत काल में न्याय और धर्म की रक्षा के लिए अधर्म का साथ न देने का संकल्प लिया था। महाराजा धृतराष्ट्र के साथ उनके संवाद आज भी ‘विदुर नीति’ के रूप में समाज को राजनीति, धर्म, न्याय और जीवन के अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।उन्होंने कहा कि महात्मा विदुर की यह भूमि केवल ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि नैतिकता, न्याय और धर्म की प्रेरणा देने वाली तपोभूमि है। इस पवित्र भूमि को प्रणाम करना उनके लिए गौरव की अनुभूति है।गंगा की अविरलता और निर्मलता का किया स्मरणडॉ. सिंह ने मां गंगा को नमन करते हुए कहा कि राजा भगीरथ के प्रयास से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ और सदियों से पतितपावनी मां गंगा जनकल्याण की धारा के रूप में मानव जीवन को निरंतर समृद्ध कर रही हैं।उन्होंने गंगा की अविरलता, निर्मलता और पवित्रता बनाए रखने को समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और जीवनधारा का अभिन्न हिस्सा हैं।प्रकृति संरक्षण को बताया जनकल्याण का आधारडॉ. दिनेश चन्द्र सिंह ने कहा कि औद्योगिक और वैज्ञानिक विकास ने मानव जीवन को सरल, सहज और गतिशील बनाया है। यातायात और तकनीक ने दूरियां कम की हैं, लेकिन विकास की इस गति के बीच प्रकृति का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।उन्होंने कहा कि यदि प्रकृति का संरक्षण नहीं किया गया तो विकास की यही गति आने वाले समय में जीवन के लिए चुनौती बन सकती है। इसलिए वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीवों की रक्षा और गौमाता के संरक्षण को जनकल्याण के व्यापक अभियान से जोड़ना होगा।उन्होंने कहा कि “जनकल्याण का मार्ग प्रकृति के संरक्षण से ही आगे बढ़ेगा।”विज्ञान के साथ साहित्य ने दी जीवन-दृष्टिअपने जीवन के अनुभवों का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि उन्होंने विज्ञान विषय से शिक्षा प्राप्त की और केमिस्ट्री में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने के साथ सीएसआईआर के रिसर्च फेलो के रूप में भी कार्य किया। हालांकि हिंदी साहित्य के अध्ययन और उसके सानिध्य ने उन्हें जीवन को देखने की एक नई दृष्टि प्रदान की।उन्होंने कहा कि प्रशासनिक जीवन में प्राप्त अनुभवों को उन्होंने पुस्तकों के माध्यम से अभिलेखित करने का प्रयास किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां प्रशासनिक चुनौतियों, आपदा प्रबंधन और जनसेवा के अनुभवों से सीख सकें।कोरोना काल की कठिन परिस्थितियों, आपदा प्रबंधन तथा महाकुंभ-2025 के अनुभवों और योगदान को उन्होंने अपनी पुस्तकों में स्थान दिया है। ‘काल प्रेरणा’, ‘कर्म निर्णय’ और ‘कर्मकुंभ-2025’ के माध्यम से उन्होंने अपने प्रशासनिक अनुभवों और अनुभूतियों को शब्दबद्ध करने का प्रयास किया है।प्रकृति के सहचर्य ने दी नई प्रेरणाविदुरकुटी क्षेत्र में चौधरी उदयवीर सिंह के साथ भ्रमण के दौरान वहां विकसित किए जा रहे सुंदर स्थल का भी उन्होंने अवलोकन किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति के सानिध्य में रहकर उन्हें प्रकृति-बोध और जनचेतना के लिए आगे बढ़ने की नई प्रेरणा मिली है।उन्होंने कहा कि समाज को आधुनिक विकास के साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनना होगा। वृक्ष, जल, वन्यजीव, गौवंश और पर्यावरण—इन सभी के संरक्षण को जीवन का हिस्सा बनाकर ही स्वस्थ और संतुलित समाज का निर्माण किया जा सकता है।अंत में डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह ने एक बार फिर बिजनौर की पवित्र धरती, यहां के नागरिकों, अपने गुरुजनों और मातृभूमि को नमन करते हुए कहा कि प्रकृति, संस्कृति और जनकल्याण के प्रति जागरूकता ही आने वाले समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।उन्होंने “जय हिन्द, जय भारत” के उद्घोष के साथ अपनी बात समाप्त की।



