गुरु के आदेश पर कृष्ण भक्ति का प्रचार कर रहे संत उमापति दास
जौनपुर। गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय सनातन संस्कृति की ऐसी गौरवशाली परंपरा है, जिसमें गुरु के आदेश को सर्वोपरि मानकर शिष्य अपने जीवन को धर्म और समाज की सेवा के लिए समर्पित करता है। इसी परंपरा का एक प्रेरणादायक उदाहरण जौनपुर के विकासखंड बक्शा क्षेत्र के ग्राम सरायलोका निवासी संत उमापति दास हैं, जिन्होंने गुरु के आदेश को जीवन का संकल्प बनाकर भारत से लेकर अफ्रीका तक भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन समर्पित कर दिया।गीता से शुरू हुई कृष्ण भक्ति की यात्राउमापति दास का जन्म एक सामान्य किसान परिवार में हुआ।
रोजगार की तलाश में वे मुंबई पहुंचे। इसी दौरान जुहू की सड़कों पर भक्तों द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता का वितरण किया जा रहा था। उन्होंने गीता की एक प्रति खरीदी और पढ़ना शुरू किया। बताया जाता है कि महज आठ दिनों में उन्होंने पूरी श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन कर लिया।गीता पढ़ने के बाद उनके मन में उस संस्था को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई, जिसके माध्यम से उन्हें यह पुस्तक मिली थी। जानकारी करने पर उन्हें पता चला कि यह संस्था जुहू स्थित इस्कॉन मंदिर है। इसके बाद वे मंदिर पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात गुडाकेश से हुई। भक्ति के प्रति उनकी रुचि देखकर वे नियमित रूप से मंगल आरती में शामिल होने लगे।गुरु से मिली नई पहचानएक दिन उमापति दास दीक्षा लेने वालों की कतार में खड़े हुए, लेकिन गुरु के पास पहुंचने पर पता चला कि सूची में उनका नाम नहीं था। वे मंदिर से बाहर निकलने लगे, तभी पीछे से आवाज आई कि महाराज जी उन्हें बुला रहे हैं।इसके बाद उनकी मुलाकात परम पूज्य गोपाल कृष्ण महाराज से हुई।
महाराज ने उनका नाम पूछा। जब उन्होंने अपना नाम ‘उमानाथ’ बताया तो महाराज ने कहा—आज से तुम्हारा नाम उमापति दास है।कुछ समय बाद गुरु ने उन्हें नियमित रूप से भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में रहने का आदेश दिया।
उमापति दास ने विनम्रता से बताया कि उनके ऊपर परिवार की जिम्मेदारियां हैं और उनके दो भाई अभी पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने गुरु से कहा कि परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद वे पूरी तरह भक्ति के लिए समर्पित होंगे।परिवार की जिम्मेदारी पूरी होते ही गुरु ने भेजा विदेशसमय बीतता गया।
उनके भाई राजनाथ के बीएसएनएल में इंजीनियर बनने के बाद उमापति दास ने स्वयं को परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त महसूस किया और गुरु के समक्ष उपस्थित हुए।
इसके बाद गोपाल कृष्ण महाराज ने उन्हें धर्म-प्रचार के लिए नैरोबी, केन्या स्थित इस्कॉन मंदिर जाने का आदेश दिया। गुरु की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उमापति दास अपनी पत्नी श्यामा प्रिया के साथ वर्ष 1989 में नैरोबी, केन्या के लिए रवाना हो गए।
कठिन परिस्थितियों में संभाली मंदिर की व्यवस्था
नैरोबी पहुंचने के बाद उन्होंने मंदिर की बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को देखा। बताया जाता है कि उस समय मंदिर में प्रसाद की व्यवस्था तक के लिए आर्थिक कठिनाइयां थीं और चोरी की घटनाएं भी होती रहती थीं।
उमापति दास ने परिस्थितियों से हार मानने के बजाय लोगों से संपर्क स्थापित करना शुरू किया। वे भारतवंशियों से मिलते, उनके संपर्क लेते और बाद में उनसे मंदिर की गतिविधियों में सहयोग करने का आग्रह करते। धीरे-धीरे लोगों का सहयोग बढ़ा और मंदिर की व्यवस्था में भी सुधार आने लगा।
उनकी मेहनत, संगठन क्षमता और कार्यकुशलता को देखते हुए गुरु गोपाल कृष्ण महाराज के आदेश पर उन्हें इस्कॉन नैरोबी का उपाध्यक्ष बनाया गया।
अफ्रीका में बढ़ाया कृष्ण भक्ति का विस्तार
समय के साथ उमापति दास ने अपनी कार्यकुशलता के बल पर इस्कॉन की गतिविधियों का विस्तार किया। उनके प्रयासों से मंदिर से जुड़ी भूमि, कृषि, पशुपालन और भक्तों के लिए आवासीय सुविधाओं का विकास हुआ।
कोविड-19 महामारी के कठिन दौर में भी उन्होंने जरूरतमंदों और भक्तों तक भोजन तथा आवश्यक वस्तुएं पहुंचाने के प्रयास किए। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों को सहायता उपलब्ध कराने का दावा किया गया।
गुरु के निधन के बाद मिली महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
5 मई 2024 को गोपाल कृष्ण महाराज के निधन के बाद इस्कॉन से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां उमापति दास को मिलीं। उन्हें इस्कॉन पूर्वी एवं मध्य अफ्रीका का जोनल सचिव तथा अफ्रीका का प्रमुख ट्रस्टी घोषित किए जाने की जानकारी सामने आई।
इसके बाद जनवरी 2025 में
संत उमापति दास ने इस्कॉन के अधिकृत दीक्षा-गुरु के रूप में जिम्मेदारी संभाली।गुरु की आज्ञा को बनाया जीवन का संकल्पसंत उमापति दास की जीवन यात्रा गुरु-भक्ति, समर्पण और सेवा की मिसाल के रूप में देखी जाती है। जौनपुर के एक सामान्य किसान परिवार से निकलकर अफ्रीका की धरती पर कृष्ण भक्ति का प्रचार करने तक का उनका सफर यह संदेश देता है कि दृढ़ संकल्प, सेवा भावना और गुरु के मार्गदर्शन से व्यक्ति अपने जीवन को व्यापक उद्देश्य के लिए समर्पित कर सकता है।
गुरु की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए देश से दूर रहकर सनातन धर्म और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के प्रचार में जुटे उमापति दास आज जौनपुर के साथ-साथ देश और विदेश में भी लोगों के लिए प्रेरणा का विषय बने हुए हैं।
